Friday, January 14, 2011

रोज़ सुबह जब आँखें खोलूं
और फिर मूँद के खुद से बोलूँ
सोजा दो पल और खिलाडी 
कर ले उठने की तय्यारी    

पर जब टूटे नींद नशे की
वक़्त सामने आये
वक़्त सामने आकर मेरे मंद मंद मुस्काए
और हाथ में लिए बीन एक मुझको बड़ा नचाये

आज सुबह में फिर यूँ भागी सर पर रख कर पैर
कौन बताये किस से  पूंछूं  
कैसा समय  का मुझसे बैर

आगामी है इम्तिहान और सर पर नींद सवार 
कौन बताये किस्से पूंछूं 
कैसा समय  का आत्याचार

ब्रूस ली लगे मामूली
लगे फीका शक्तिमान
एक बात तो सच है भैया 
समय  बड़ा बलवान

जब भी देखूं वक़्त घडी में
मुझे देख वो सरपट दौड़े 
यूँ नहीं की बैठे दो पल
करे वो मुझसे बात
कर लो  बेटा काम अधूरा 
जल्दी की क्या बात

मगर नहीं लगती है उसको इंसानों की दुनिया प्यारी
न शौक  है उसको सिनेमा का 
न गाने सुनने  की बीमारी
उसको तो बस एक है काम 
जिससे दुनिया में उसका नाम
वक़्त उसीके साथ चला है
वक़्त उसीके साथ चलेगा
चलते रहना जिसका काम

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